नवजात शिशु में कौन से टीके पहले लगते हैं - जन्म पर हैपेटाइटिस B, BCG और शेड्यूल

नवजात शिशु के पहले टीके - जन्म पर BCG व हैपेटाइटिस B

नवजात शिशु के साथ शुरुआती कुछ हफ्ते अक्सर दूध पिलाने, नैपी बदलने और हर तरह की रोने की आवाज़ का मतलब समझने में निकल जाते हैं। जैसे‑तैसे आप थोड़े सहज होते हैं कि कोई पूछ लेता है – «पहले टीके कब लगने हैं?» और दिमाग में नये सवालों की एक लंबी सूची बन जाती है।

अगर आप भी सोच रहे हैं कि नवजात शिशु में कौन से टीके पहले लगाए जाते हैं, वे इतने जल्दी क्यों दिए जाते हैं और बाद में क्या सामान्य है, तो आप अकेले नहीं हैं। आइए इसे धीरे‑धीरे और साफ तरीके से समझते हैं।

यह लेख मुख्य रूप से भारत के संदर्भ में लिखा गया है, पर इसमें उन टीकों पर खास ध्यान है जो कई देशों में जन्म पर या जीवन के पहले दिनों में दिये जाते हैं - जैसे हैपेटाइटिस बी टीका (जन्म के 24 घंटे में दी जाने वाली खुराक, जो आगे की सीरीज़ का हिस्सा होती है) और बीसीजी टीका जो ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) से सुरक्षा देता है। इसके साथ‑साथ हम यह भी देखेंगे कि ये टीके पूरे नवजात टीकाकरण शेड्यूल और पहले साल के टीकाकरण में कहाँ फिट बैठते हैं।


नवजात शिशु टीकाकरण क्यों ज़रूरी है

आपका बच्चा दुनिया में कुछ सुरक्षा लेकर ही आता है। गर्भावस्था के आखिरी महीनों में आपके खून के एंटीबॉडी प्लेसेंटा के ज़रिये बच्चे तक पहुँचते हैं और अगर आप स्तनपान करा रही हैं तो दूध के साथ भी थोड़ी बहुत सुरक्षा मिलती रहती है। यह मददगार तो है, लेकिन:

  • यह सुरक्षा कुछ समय के लिए ही रहती है
  • हर तरह के संक्रमण के खिलाफ पूरी नहीं होती
  • हर माँ और हर बच्चे में अलग‑अलग हो सकती है

कई संक्रमण ऐसे हैं जो खासकर जीवन के पहले महीनों में बहुत खतरनाक हो सकते हैं। बच्चा छोटा होता है, उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अभी विकसित हो रही होती है और वह जल्दी गंभीर रूप से बीमार हो सकता है।

टीकाकरण, बच्चे की इम्यून सिस्टम को एक तरह की «चीट शीट» दे देता है। असली, खतरनाक जीवाणु या वायरस से पहली बार बिना तैयारी के भिड़ने के बजाय, शरीर पहले उसके सुरक्षित, कमज़ोर या छोटे हिस्से को देख लेता है और उससे लड़ना सीख जाता है। बाद में यदि असली संक्रमण आता है तो शरीर पहले से तैयार रहता है।

दुनिया भर में टीकाकरण को बच्चों को गंभीर बीमारियों, विकलांगता और समय से पहले मौत से बचाने के सबसे असरदार तरीकों में से एक माना जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल लाखों जानें केवल टीकों की वजह से बच जाती हैं। ये सब कोई दूर की बात नहीं, इन्हीं में हमारे‑आपके जैसे सामान्य बच्चे शामिल होते हैं।


जन्म पर और पहले दिनों में लगने वाले टीके: एक झलक

भारत सहित कई देशों में नवजात शिशु के टीके कुछ खास बीमारियों पर केंद्रित होते हैं। सरकारी अस्पतालों में नवजात टीकाकरण शेड्यूल अक्सर राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) के अनुसार तय होता है, पर निजी अस्पतालों में कुछ अतिरिक्त या अलग समय पर दिए जाने वाले टीके भी ऑफर हो सकते हैं।

जन्म के समय या पहले महीने में आम तौर पर ये टीके सामने आते हैं:

  • हैपेटाइटिस बी टीका (जन्म खुराक)

    • अगर संभव हो तो जन्म के 24 घंटे के भीतर लगवाने की सलाह दी जाती है
    • यह आम तौर पर 3 या 4 खुराकों की सीरीज़ का पहला इंजेक्शन होता है, जो पहले साल में पूरा किया जाता है
  • बीसीजी टीका (ट्यूबरकुलोसिस के लिए)

    • अक्सर जन्म के समय, अस्पताल से डिस्चार्ज से पहले या जीवन के पहले कुछ हफ्तों में दिया जाता है
    • आमतौर पर एक ही खुराक लगती है और ऊपरी बांह पर एक छोटा‑सा बीसीजी का निशान छोड़ जाती है

कई माता‑पिता चौंक जाते हैं कि इतनी जल्दी से टीके क्यों लगाने पड़ते हैं। यह थोड़ा अचानक‑सा लग सकता है। इसलिए आगे हर टीके को अलग‑अलग समझते हैं - क्यों ज़रूरी है, कब दिया जाता है और उसके बाद क्या उम्मीद रखनी चाहिए।


हैपेटाइटिस बी टीका: जन्म पर ही क्यों दिया जाता है?

हैपेटाइटिस बी क्या है?

हैपेटाइटिस बी एक वायरस है जो जिगर (लिवर) पर हमला करता है। बड़ों में यह तेज पीलिया, थकान, उल्टी आदि के साथ दिख सकता है, लेकिन नवजात शिशु में हैपेटाइटिस बी क्यों चिंता की बात है, वह इसकी एक और खासियत है - क्रॉनिक (दीर्घकालिक) संक्रमण

अगर बच्चा जन्म के समय या शुरुआती महीनों में हैपेटाइटिस बी से संक्रमित हो जाए तो लगभग 90 प्रतिशत तक बच्चों में यह वायरस शरीर में सालों तक बना रह सकता है और चुपचाप जिगर को खराब करता रहता है। आगे चलकर इससे जोखिम बढ़ जाता है:

  • सिरोसिस (जिगर का गंभीर सिकुड़ना और खराब होना)
  • लिवर फेल्योर
  • लिवर कैंसर

हैपेटाइटिस बी से संक्रमित बहुत‑से वयस्क खुद को बिल्कुल ठीक महसूस करते हैं और उन्हें पता तक नहीं चलता कि वे वायरस के कैरियर हैं। सिर्फ देखकर यह बताना संभव नहीं कि किसे संक्रमण है और किसे नहीं।

जन्म के तुरंत बाद खुराक देना इतना ज़रूरी क्यों

आपके डॉक्टर या नर्स अक्सर «वर्टिकल ट्रांसमिशन» शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं। इसका मतलब होता है - माँ से बच्चे में संक्रमण का जाना, खासकर गर्भावस्था या डिलीवरी के समय।

अगर माँ को हैपेटाइटिस बी है और हैपेटाइटिस बी टीका समय पर न दिया जाए तो डिलीवरी के दौरान बच्चे के संक्रमित होने का खतरा काफी ज़्यादा रहता है। बिना किसी सुरक्षा के पैदा होने वाले ऐसे बच्चों में से बड़ी संख्या में वायरस हमेशा के लिए शरीर में रह सकता है।

इसीलिए हैपेटाइटिस बी जन्म के 24 घंटे में लगवाने की इतनी जोरदार सलाह दी जाती है:

  • पहली खुराक आमतौर पर जन्म के पहले 24 घंटे के अंदर दी जाती है
  • इससे डिलीवरी के दौरान वायरस के संपर्क में आये बच्चे के संक्रमित होने की संभावना बहुत कम हो जाती है
  • यह सुरक्षा तभी ज़्यादा अच्छी तरह काम करती है जब टीका तुरंत, न कि हफ्तों बाद लगाया जाए

अगर गर्भावस्था के दौरान जाँच में माँ में हैपेटाइटिस बी पाया गया है, तो आमतौर पर डॉक्टर:

  1. शिशु को हैपेटाइटिस बी टीका जन्म के तुरंत बाद लगवाते हैं
  2. आगे की खुराकों की तारीखें तय कर देते हैं - आम तौर पर 6, 10 और 14 हफ्ते / या 6, 10, 14 हफ्ते और 6 महीने, यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस शेड्यूल का पालन हो रहा है
  3. कुछ स्थितियों में जन्म पर ही एक अतिरिक्त इंजेक्शन दिया जाता है जिसे हैपेटाइटिस बी इम्युनोग्लोब्युलिन (HBIG) कहते हैं - यह तैयार एंटीबॉडी होते हैं जो बहुत ज़्यादा जोखिम वाले मामलों में तुरंत सुरक्षा देते हैं

भारत सहित कई देश अब हर नवजात को हैपेटाइटिस बी की जन्म खुराक देने की ओर बढ़ रहे हैं, केवल उच्च जोखिम वाले बच्चों तक सीमित नहीं। इसका कारण सीधा है - सभी कैरियर माताओं की पहचान हमेशा संभव नहीं होती, इसलिए जन्म पर दिया गया टीका एक तरह से सुरक्षा जाल का काम करता है।

यह एक पूरी सीरीज़ है, सिर्फ एक इंजेक्शन नहीं

हैपेटाइटिस बी टीका एक बार लगाकर मामला खत्म नहीं होता। लंबे समय की अच्छी सुरक्षा के लिए कई खुराकों की सीरीज़ पूरी करनी ज़रूरी है।

भारत के राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के अनुसार आम तौर पर:

  • एक खुराक जन्म के तुरंत बाद
  • फिर 6, 10 और 14 हफ्तों पर कॉम्बिनेशन वैक्सीन (जैसे पेंटावैलेंट या हेक्सावैलेंट) के साथ, जिसमें हैपेटाइटिस बी भी शामिल होता है

कुछ उच्च जोखिम वाले बच्चों में योजना थोड़ी अलग हो सकती है या अतिरिक्त खुराक लगाई जा सकती है। आपके बच्चे की टीकाकरण कार्ड या MCP कार्ड (मदर चाइल्ड प्रोटेक्शन कार्ड) पर डॉक्टर यह सब साफ‑साफ लिख देते हैं।

अगर खुराकें छूट जाएँ या बहुत देर से लगें तो खासकर उन बच्चों में सुरक्षा में गैप आ सकता है जो जन्म से ही जोखिम में हैं।

हैपेटाइटिस बी टीके के बाद क्या अनुभव हो सकता है

ज्यादातर बच्चे हैपेटाइटिस बी टीका आसानी से झेल लेते हैं। सामान्य और हल्के साइड इफेक्ट्स में शामिल हो सकते हैं:

  • इंजेक्शन वाली जगह पर हल्की लालिमा या सूजन
  • थोड़ा चिड़चिड़ा होना या सामान्य से ज़्यादा रोना
  • हल्का बुखार

ये सब टीके की वजह से इम्यून सिस्टम के एक्टिव होने के संकेत हैं और आमतौर पर खुद‑ब‑खुद 1–2 दिन में ठीक हो जाते हैं।

इस टीके से हैपेटाइटिस बी नहीं होता। इसमें जीवित वायरस नहीं होता, इसलिए यह खुद बीमारी पैदा नहीं कर सकता।


बीसीजी टीका: नवजात को ट्यूबरकुलोसिस से बचाव

ट्यूबरकुलोसिस क्या है?

ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) एक संक्रामक बीमारी है जो आमतौर पर माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नाम के जीवाणु से होती है। कई लोगों को लगता है कि टीबी तो पुरानी पीढ़ियों की बीमारी है, लेकिन आज भी भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में यह आम है। भारत उन देशों में शामिल है जहाँ टीबी के मरीज़ों की संख्या अधिक है, इसलिए यहाँ ट्यूबरकुलोसिस टीका नवजात को देना और भी अहम माना जाता है।

टीबी ज़्यादातर फेफड़ों को प्रभावित करती है और इसके लक्षण हो सकते हैं:

  • लंबे समय तक रहने वाली खाँसी
  • वजन घटना
  • रात में पसीना आना
  • लगातार थकान

छोटे बच्चों में टीबी का खतरा सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता। यह शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकती है। सबसे डरावनी स्थितियाँ हैं:

  • टीबी मेनिंजाइटिस - दिमाग और उसके आस‑पास की झिल्लियों में संक्रमण
  • मिलियरी टीबी - जब टीबी पूरे शरीर में छोटे‑छोटे धब्बों की तरह फैल जाती है

ऐसे संक्रमण से गंभीर विकलांगता या जान जाने तक का खतरा हो सकता है। इसलिए बीसीजी टीका का मुख्य उद्देश्य बड़े होने पर होने वाली फेफड़ों वाली टीबी से ज़्यादा, नवजात और छोटे बच्चों में होने वाली गंभीर टीबी की संभावना को कम करना है।

भारत में किन बच्चों को बीसीजी दिया जाता है?

भारत में राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत हर नवजात को, यदि कोई विशेष रोक न हो, बीसीजी टीका देने की सिफारिश की जाती है। आम तौर पर यह:

  • सरकारी अस्पताल या नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जन्म के समय या पहले अवसर पर दिया जाता है
  • अगर जन्म के समय किसी कारण से नहीं लगा तो जीवन के पहले साल में, जितना जल्दी हो सके, लगा लिया जाता है

कुछ अन्य देशों की तरह यहाँ इसे सिर्फ «उच्च जोखिम» वाले बच्चों तक सीमित नहीं रखा जाता, क्योंकि हमारे यहाँ टीबी का बोझ अधिक है।

जन्म या शुरुआती हफ्तों में ही बीसीजी क्यों

गंभीर टीबी का जोखिम जीवन के पहले 5 साल में, खासकर 2 साल से कम उम्र में ज़्यादा होता है। अगर बच्चा जल्दी उम्र में ही किसी टीबी रोगी के संपर्क में आ जाए तो पहले से सुरक्षा रहना फायदेमंद है।

इसलिए बीसीजी टीका:

  • जन्म या शुरुआती हफ्तों में लग जाए तो परिवार, रिश्तेदारों और बाहर‑भीतर आने वाले लोगों के संपर्क से पहले ही कुछ हद तक सुरक्षा तैयार हो जाती है
  • टीबी मेनिंजाइटिस और मिलियरी टीबी जैसी जटिल और खतरनाक स्थितियों की संभावना को काफी कम करता है
  • अस्पताल से डिस्चार्ज और शुरुआती चेक‑अप के साथ आसानी से जोड़ा जा सकता है

कई दूसरे टीकों की तरह इसे बार‑बार दोहराने की ज़रूरत नहीं होती। ज़्यादातर बच्चों में बीसीजी एक ही खुराक काफी मानी जाती है।

बीसीजी का निशान: क्या सामान्य है?

बीसीजी की सबसे पहचानी जाने वाली बात है ऊपरी बांह पर बना बीसीजी का निशान

बीसीजी टीका आम तौर पर बांह के ऊपरी हिस्से की त्वचा के ठीक नीचे (इन्ट्राडर्मल) लगाया जाता है। इसके बाद जो प्रतिक्रिया होती है, वह कुछ चरणों से गुजरती है:

  1. पहले कुछ दिन

    • इंजेक्शन वाली जगह पर हल्का लाल‑सा छोटा उभार दिखता है
  2. अगले कुछ हफ्ते

    • यह दाना थोड़ा बड़ा हो सकता है, बीच में हल्का उठा हुआ हिस्सा दिख सकता है
    • कभी‑कभी यह छोटे फफोले या पिम्पल जैसा लग सकता है
  3. आने वाले हफ्तों से महीनों तक

    • उस जगह पर हल्की‑सी पीप निकल सकती है या पपड़ी बन सकती है
    • धीरे‑धीरे सूख कर वहाँ छोटा गोल निशान रह जाता है, जो आम तौर पर 2 से 10 मिमी के बीच होता है

यह पूरा प्रोसेस सामान्य माना जाता है। असल में यह निशान इस बात का संकेत है कि बीसीजी ने अपना काम किया है।

ध्यान रखें:

  • उस दाने या फफोले को न दबाएँ, न फोड़ें
  • बिना ज़रूरत उस पर लगातार टाइट पट्टी या प्लास्टर न लगाएँ
  • डॉक्टर की सलाह के बिना कोई क्रीम, मलहम या एंटीसेप्टिक न लगाएँ

अगर उस जगह की लालिमा बहुत ज्यादा हो, त्वचा बहुत गर्म लगे, दर्द बहुत बढ़ जाए या बहुत ज़्यादा मवाद निकलता दिखे तो बाल रोग विशेषज्ञ से ज़रूर दिखा लें, ताकि किसी और संक्रमण की संभावना देखी जा सके। ज़्यादातर बच्चों में बीसीजी का घाव धीरे‑धीरे खुद ही भर जाता है।


नवजात टीके साइड इफेक्ट्स: क्या सामान्य है, क्या नहीं

चाहे जन्म पर टीका हो या बाद में रूटीन टीकाकरण के इंजेक्शन, ज्यादातर बच्चों में कुछ समान, हल्की और अस्थायी प्रतिक्रियाएँ देखी जा सकती हैं।

सामान्य और अपेक्षित प्रतिक्रियाएँ:

  • हल्का बुखार (लगभग 38 डिग्री सेल्सियस तक), जो अक्सर पहले 24 घंटे में दिखता है
  • इंजेक्शन की जगह पर लालिमा, सूजन या हल्की कठोरता
  • सामान्य से ज़रा ज़्यादा रोना, चिपकू या चिड़चिड़ा रहना
  • एकाध फीड थोड़ा कम लेना
  • नींद का पैटर्न एक दिन के लिए थोड़ा बदल जाना

ये सब आम तौर पर 1–2 दिन में अपने आप ठीक हो जाते हैं।

कब डॉक्टर से तुरंत सलाह लेनी चाहिए

अपने बच्चे को आप सबसे अच्छी तरह जानते हैं। अगर आपको कुछ भी असामान्य लगे या मन न माने तो बिना झिझक बाल रोग विशेषज्ञ या नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र में बात कर लें।

आम मार्गदर्शन के तौर पर, तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें अगर:

  • बच्चे को 38.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा बुखार हो और यह 48 घंटे से ज़्यादा बना रहे
  • इंजेक्शन वाली जगह बहुत ज़्यादा लाल, सूजी हुई लगे या कुछ दिनों बाद अचानक और खराब दिखने लगे
  • बच्चा लगातार बहुत सुस्त हो, बहुत ढीला‑ढाला या उनींदा लगे, उठाने पर भी मुश्किल से रेस्पॉन्ड करे
  • एलर्जी के संकेत दिखें, जैसे:
    • चेहरे, होंठ या जीभ में सूजन
    • सांस लेने में दिक्कत
    • पूरे शरीर पर तेज दाने या चकत्ते

ऐसी गंभीर एलर्जिक रिएक्शन बेहद कम होते हैं, और अस्पताल या टीका लगने की जगह पर स्टाफ इनसे निपटने के लिए प्रशिक्षित और तैयार रहता है।


टीका लगने के बाद बच्चे को कैसे आराम दें

कोई भी माता‑पिता अपने छोटे से बच्चे को इंजेक्शन लगते और रोते नहीं देखना चाहता। थोड़ी‑सी तैयारी और प्यार भरा स्पर्श इस अनुभव को आप दोनों के लिए आसान बना सकता है।

बच्चे को सुकून देने के कुछ आसान तरीके:

  • स्किन‑टू‑स्किन कॉन्टैक्ट

    • टीका लगने के बाद बच्चे को अपने नंगे सीने से लगाकर पकड़ें
    • इससे उसकी सांस, दिल की धड़कन और तापमान को स्थिर रहने में मदद मिलती है
  • स्तनपान या बोतल से दूध

    • कई बार टीके के दौरान या तुरंत बाद फीड कराना बच्चे को काफी शांत कर देता है
    • माँ का दूध हल्का दर्द कम करने और सुकून देने में मदद कर सकता है
  • धीरे‑धीरे झुलाना या गोद में लेकर टहलना

    • कमरे में हल्का‑हल्का घूमना, झूला कुर्सी पर झुलाना या बेबी स्लिंग में रखना आम तौर पर बच्चों को जल्दी शांत करता है
  • धीमी आवाज़ में बात करना या लोरी गाना

    • आपकी आवाज़ ही उसके लिए सबसे भरोसेमंद चीज़ है

हल्के बुखार या दर्द में डॉक्टर कभी‑कभी पैरासिटामोल ड्रॉप्स की सलाह दे सकते हैं, खासकर आगे चलकर कुछ विशेष टीकों (जैसे मेनिंजाइटिस B जैसे टीके, जहाँ उपलब्ध हों) के साथ। हमेशा डॉक्टर की लिखी डोज़ और दवा के निर्देशों का सख्ती से पालन करें और केवल शिशु के लिए बनी तैयारी ही दें।


नवजात शिशु टीकाकरण को लेकर आम चिंताएँ

«इतने छोटे बच्चे को इतने सारे टीके, कहीं ज़्यादा तो नहीं?»

यह चिंता लगभग हर घर में उठती है। सुनने में यह सवाल वाजिब लगता है, लेकिन इम्यून सिस्टम वास्तव में कैसे काम करता है, उससे पूरी तरह मेल नहीं खाता।

हर दिन आपके बच्चे का शरीर हज़ारों तरह के एंटीजन से मिलता है। एंटीजन मतलब कोई भी बाहरी प्रोटीन या अंश - जैसे कीटाणु, धूल, पराग कण, खाने के प्रोटीन, त्वचा और मुँह में रहने वाले बैक्टीरिया आदि। जन्म के बाद से ही बच्चा चारों तरफ मौजूद जीवाणुओं, वायरस और फफूँद के संपर्क में रहता है।

इसके मुकाबले नवजात शिशु के टीके इम्यून सिस्टम पर बहुत छोटा‑सा «लोड» डालते हैं। आधुनिक वैक्सीन पहले की पीढ़ी के टीकों की तुलना में कहीं ज़्यादा शुद्ध हैं, यानी आज भले ही टीकों की संख्या बढ़ी हो, लेकिन उनमें कुल एंटीजन की गिनती कई दशक पहले की तुलना में कम है।

स्वस्थ, समय पर पैदा हुए शिशु का इम्यून सिस्टम रोज़मर्रा के हर तरह के एक्सपोज़र के साथ‑साथ टीकों को भी आसानी से संभाल सकता है। «टीकाकरण से इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ जाएगा» जैसी बातें वैज्ञानिक प्रमाणों से मेल नहीं खातीं।

वैक्सीन में और क्या‑क्या होता है, क्या वे सुरक्षित हैं?

हर टीके में सिर्फ बीमारी वाला हिस्सा (एंटीजन) ही नहीं, बल्कि और भी कुछ सहायक चीज़ें हो सकती हैं, जैसे:

  • टीके को स्थिर रखने के लिए हल्के प्रिज़र्वेटिव या स्टेबलाइज़र
  • pH और नमक संतुलन के लिए कुछ साल्ट और शुगर
  • निर्माण प्रक्रिया में इस्तेमाल हुई चीज़ों के बहुत बचे‑खुचे, सूक्ष्म अंश

ये सारी चीज़ें इतनी कम मात्रा में होती हैं कि वे भारतीय नियामक संस्थाओं, जैसे ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) और राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह ऑन इम्यूनाइज़ेशन (NTAGI) द्वारा तय सीमा से काफी नीचे रहती हैं। WHO भी समय‑समय पर इन मानकों की समीक्षा करता है।

आपका बच्चा जैसे‑जैसे बड़ा होगा, खाने‑पीने, पानी और वातावरण के ज़रिये अक्सर इन्हीं पदार्थों से कहीं ज़्यादा मात्रा में रोज़ाना रूबरू होगा। मसलन, कई बार फार्मूला दूध या बाद में मिलने वाला साधारण पीने का पानी भी कुछ तत्वों की मात्रा में एक टीके से ज़्यादा हो सकता है।

भारत के नवजात टीकाकरण शेड्यूल और बाकी सभी रूटीन टीकों को बड़े‑बड़े अध्ययनों में हज़ारों बच्चों पर परखने के बाद स्वीकृति दी जाती है और बाद में भी लगातार निगरानी रखी जाती है ताकि कोई दुर्लभ साइड इफेक्ट सामने आए तो उसका रिकॉर्ड रखा जा सके।

टीके टाल देना या बहुत देर से लगवाना, क्या यह सुरक्षित है?

कई बार माता‑पिता सोचते हैं कि «अभी छोटा है, थोड़ा बड़ा हो जाए तब टीका लगवा देंगे», यह उन्हें बीच का सुरक्षित रास्ता लगता है। पर व्यवहार में इससे वही उम्र का समय बिना सुरक्षा के निकलता है, जब कुछ बीमारियाँ सबसे ज़्यादा खतरनाक होती हैं।

उदाहरण के लिए:

  • हैपेटाइटिस बी - जन्म के समय संक्रमित होने की संभावना को घटाने के लिए जन्म खुराक ज़रूरी है। जितनी देर होगी, उतना संक्रमण और आगे चलकर गंभीर लिवर रोग का जोखिम बढ़ सकता है।
  • ट्यूबरकुलोसिस (बीसीजी) - टीबी मेनिंजाइटिस और मिलियरी टीबी जैसी जटिलताएँ ज़्यादातर कम उम्र के बच्चों में ही दिखती हैं। जल्दी दिया गया बीसीजी इन्हीं सबसे गंभीर रूपों से बचाव के लिए होता है।

कई «वैकल्पिक» या बहुत खींचे हुए टीकाकरण शेड्यूल सोशल मीडिया पर दिखते हैं, लेकिन उनके पीछे कोई भरोसेमंद वैज्ञानिक आधार नहीं होता, न ही राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थाएँ उन्हें सुझाती हैं। वे केवल उस अवधि को बढ़ा देते हैं जिसमें आपका बच्चा बिना वजह असुरक्षित बना रहता है।

अगर आपके मन में डर या संशय है तो चुपचाप डेट आगे बढ़ाने के बजाय अपने बाल रोग विशेषज्ञ या स्वास्थ्य कार्यकर्ता से खुलकर बात कीजिए। आपके बच्चे की खास स्थिति को देखकर वे हर टीके का लाभ और जोखिम समझा सकते हैं।


पहले साल का टीकाकरण शेड्यूल: नवजात टीके कहाँ फिट होते हैं?

पहले महीने में टीके असल में एक लम्बी, योजनाबद्ध श्रृंखला की शुरुआत हैं।

भारत के सरकारी कार्यक्रम (UIP) में पहले साल का सामान्य टीकाकरण शेड्यूल लगभग इस तरह होता है (कुछ राज्यों या निजी सेटअप में इसमें थोड़े बदलाव या अतिरिक्त वैक्सीन हो सकते हैं):

  • जन्म के समय

    • बीसीजी टीका (ट्यूबरकुलोसिस के लिए)
    • ओरल पोलियो वैक्सीन (ओपीवी, जन्म खुराक)
    • हैपेटाइटिस बी टीका - जन्म खुराक (आदर्श रूप से, जन्म के 24 घंटे के भीतर)
  • 6 हफ्ते (डेढ़ महीना)

    • OPV
    • IPV (कभी‑कभी कॉम्बिनेशन वैक्सीन में शामिल)
    • पेंटावैलेंट / हेक्सावैलेंट वैक्सीन (डिप्थीरिया, टिटनस, काली खाँसी, Hib और हैपेटाइटिस बी सहित)
    • रोटावायरस ओरल वैक्सीन
  • 10 हफ्ते

    • दूसरी खुराक पेंटावैलेंट / हेक्सावैलेंट
    • OPV
    • रोटावायरस की दूसरी खुराक (अगर शेड्यूल में हो)
  • 14 हफ्ते

    • तीसरी खुराक पेंटावैलेंट / हेक्सावैलेंट
    • OPV / IPV
    • न्यूमोकोकल वैक्सीन (कई जगहों पर शामिल)
  • लगभग 9–12 महीने

    • खसरा‑रूबेला (MR या MMR, उपलब्धता के अनुसार)
    • न्यूमोकोकल की अगली खुराक, जहाँ शेड्यूल में हो
    • कुछ राज्यों में जापानी एन्सेफलाइटिस समेत अन्य टीके भी

जैसा कि देखा, हैपेटाइटिस बी टीका की जन्म खुराक के बाद, आगे की खुराकें इन्हीं कॉम्बिनेशन वैक्सीन में शामिल रहती हैं। इससे नवजात शिशु टीकाकरण व्यवस्थित तरीके से पूरा होता है।

आपके बच्चे का टीकाकरण कार्ड / MCP कार्ड इस पूरे शेड्यूल का सबसे भरोसेमंद गाइड है। हर टीके की तारीख, बैच नंबर और शेड्यूल वहाँ दर्ज होता है। ज़रूरत पड़े तो नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र, सरकारी वेबसाइट या विश्वसनीय बाल रोग विशेषज्ञ से भी ताज़ा जानकारी ली जा सकती है।


अंतिम बातें

नवजात शिशु टीकाकरण पर फैसला लेते समय अक्सर दिल और दिमाग दोनों भारी हो जाते हैं। आपसे कहा जा रहा होता है कि अभी एक‑आध दिन की असुविधा और हल्का दर्द झेलने दीजिए, ताकि भविष्य की किसी ऐसी बीमारी से बचाव हो सके जिसे आपने देखा भी न हो, और शायद कभी देखेंगे भी नहीं।

बचाव की यही अजीब बात है - जब टीके काम करते हैं, तो कुछ दिखाई ही नहीं देता।
कोई हैपेटाइटिस बी नहीं जो चुपचाप सालों तक जिगर को खराब करता रहे।
कोई टीबी मेनिंजाइटिस नहीं, जिसमें दो साल का बच्चा अचानक बेहोश होने लगे या चलना बंद कर दे।
कोई ऐसी इमरजेंसी नहीं जिसमें भाग‑दौड़ करके अस्पताल पहुँचने की नौबत आए, जबकि उससे बचा जा सकता था।

बीसीजी टीका, हैपेटाइटिस बी टीका और बाकी नवजात शिशु के टीके किसी फार्म भरने की औपचारिकता नहीं हैं। ये आपके बच्चे के स्वस्थ और लंबी उम्र वाले जीवन के पक्ष में तराजू का पलड़ा भारी करने के ठोस, वैज्ञानिक तौर पर जाँचे‑परखे तरीके हैं।

सवाल पूछिए, समय लीजिए, जानकारी समझिए। और जब आप तय करते हैं कि नवजात टीकाकरण सुरक्षित है और ज़रूरी भी, तो यह आपके बच्चे को उसकी सबसे नाज़ुक उम्र में सुरक्षा देने के सबसे मजबूत और भरोसेमंद तरीकों में से एक होता है।


यह सामग्री केवल सूचना के उद्देश्यों के लिए है और इसका उपयोग आपके डॉक्टर, बाल रोग विशेषज्ञ या अन्य स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर की सलाह के विकल्प के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। यदि आपके कोई प्रश्न या चिंताएँ हैं, तो आपको स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर से परामर्श करना चाहिए।
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Erby — नवजात शिशुओं और स्तनपान कराने वाली माँओं के लिए बेबी ट्रैकर

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