नए बच्चे के साथ शुरुआती हफ्ते अक्सर दूध पिलाने, नैपी बदलने, छोटी-छोटी झपकियों और हर रोने का मतलब समझने में निकल जाते हैं। अगर आपका शिशु 7 या 8 सप्ताह का है, तो मन में यह सवाल आना स्वाभाविक है कि 2 महीने में नींद की दिनचर्या कैसे शुरू करें।
जवाब है, हाँ, लेकिन बहुत नरमी और लचीलेपन के साथ। इस उम्र में रूटीन का मतलब बच्चे को पूरी रात बिना जागे सुलाना नहीं है। इसका उद्देश्य बस इतना है कि शाम का समय बच्चे और माता-पिता, दोनों के लिए थोड़ा शांत और अनुमान लगाने लायक बने।
बहुत से माता-पिता पूछते हैं कि बच्चे की नींद पैटर्न कब बनते हैं। 7 से 8 सप्ताह की उम्र इसके लिए बहुत ठीक समय हो सकती है। न तो आप जल्दी कर रहे हैं, न कोई मौका निकल गया है।
नवजात अवस्था में बच्चे दिन और रात का फर्क बड़ों की तरह नहीं समझते। उनका सोना-जागना पूरे दिन बिखरा रहता है और पेट छोटा होने के कारण उन्हें बार-बार दूध की जरूरत पड़ती है। लेकिन करीब दो महीने के आसपास कुछ बदलाव दिखने लगते हैं।
नवजात में सर्केडियन रिदम, यानी शरीर की अंदरूनी घड़ी, धीरे-धीरे विकसित होने लगती है। बच्चे का शरीर समझना शुरू करता है कि दिन में रोशनी, आवाजाही और छोटी नींदें होती हैं, जबकि रात लंबी आराम वाली नींद के लिए है। इसी समय शिशु में मेलाटोनिन विकास भी शुरू होता है। मेलाटोनिन वह हार्मोन है जो शाम को नींद आने में मदद करता है।
आपको कुछ संकेत नजर आ सकते हैं:
इसका यह अर्थ नहीं कि बच्चा अब मिनटों के हिसाब से बनी कठोर नींद-सारिणी के लिए तैयार है। इसका मतलब बस इतना है कि रोज दोहराए जाने वाले आसान संकेत उसे समझ आने लगेंगे।
इसे बुनियाद तैयार करने जैसा मानें। आप हर रात बच्चे को यह एहसास दिला रहे हैं कि “अब सोने की तैयारी का समय है।”
इस उम्र में रूटीन का मतलब फ्रिज पर चिपका हुआ ऐसा टाइमटेबल नहीं है, जिसमें हर फीड और हर झपकी का समय तय हो। दो महीने के बच्चे की भूख बदल सकती है, दिन की नींद कभी लंबी तो कभी बहुत छोटी हो सकती है, और कुछ दिन पूरी योजना उलट-पुलट भी हो सकती है। नवजात शिशु नींद में यह बिल्कुल सामान्य है।
रूटीन का मतलब है, हर दिन होने वाली गतिविधियों का एक जाना-पहचाना क्रम।
मिसाल के लिए, जरूरी नहीं कि आपका बच्चा हर रात ठीक 7:30 बजे सोए। लेकिन सोने का समय आते-आते उसे रोज वही संकेत मिलने लगें - रोशनी धीमी होती है, कपड़े बदलते हैं, दूध मिलता है, कमरा शांत होता है और फिर बच्चे को उसके सोने की सुरक्षित जगह पर लिटाया जाता है।
यही दोहराव सबसे ज्यादा मायने रखता है।
इस उम्र में लचीली शिशु की नींद की दिनचर्या बच्चे की प्राकृतिक लय के अनुसार चलती है, न कि उसे घड़ी के अनुसार चलाने की कोशिश करती है। बच्चे की नींद आने के संकेतों पर ध्यान दें, जैसे:
कुछ बच्चे बहुत हल्के संकेत देते हैं, जबकि कुछ एक मिनट पहले तक खुश होते हैं और फिर अचानक बहुत रोने लगते हैं। समय के साथ आप अपने बच्चे के संकेत बेहतर ढंग से पहचानने लगेंगे।
सबसे अच्छा बेडटाइम रूटीन वही है जिसे आप थके हुए दिन में भी निभा सकें। इसके लिए महंगे सामान, खास संगीत या लंबी सूची की जरूरत नहीं है। जितना सरल रखें, उतना आसान होगा।
पूरी प्रक्रिया करीब 15 से 20 मिनट की रखिए। परिवार की सुविधा के अनुसार क्रम बदला जा सकता है, पर कोशिश करें कि अधिकतर रातों में वही क्रम बना रहे।
सोने से करीब 30 मिनट पहले रोशनी धीमी करें।
कम रोशनी बच्चे की विकसित होती बॉडी क्लॉक को संकेत देती है कि दिन समाप्त हो रहा है। कमरे को पूरी तरह अंधेरा करने की जरूरत नहीं, बस तेज ट्यूबलाइट की जगह हल्की लैम्प लाइट या नाइट लाइट रख सकते हैं।
अगर बच्चे को अच्छा लगे तो गुनगुने पानी से नहलाएं।
कुछ बच्चों को नहाने से बहुत सुकून मिलता है। कुछ इतने उत्साहित हो जाते हैं कि मानो खेल का समय शुरू हो गया हो। यदि नहाने के बाद बच्चा ज्यादा चंचल हो जाता है, तो नहलाना शाम में पहले कर दें या रोज न नहलाएं।
साफ नैपी और आरामदायक रात के कपड़े पहनाएं।
यह बच्चे के लिए सोने का स्पष्ट संकेत बन सकता है। आवाज धीमी रखें और इस दौरान ज्यादा खेल या गुदगुदी से बचें।
बच्चे को दूध पिलाएं।
दो महीने की उम्र में सोने से पहले दूध पीना बिल्कुल सामान्य है। स्तनपान या फॉर्मूला दूध बच्चे को शांत करने का बड़ा हिस्सा हो सकता है। अभी दूध और नींद को अलग करने की कोई जल्दी नहीं है।
एक शांत संकेत जोड़ें।
लोरी गाएं, कपड़े वाली छोटी किताब दिखाएं या हर रात एक ही प्यार भरा वाक्य कहें। बच्चा शब्दों का अर्थ न भी समझे, आपकी आवाज और उसका लय उसे परिचित लगेगा।
बच्चे को उसकी सुरक्षित सोने की जगह पर लिटाएं।
गद्दा सख्त और समतल होना चाहिए। बच्चे को पीठ के बल सुलाएं। भारतीय बाल रोग विशेषज्ञों और सुरक्षित नींद संबंधी सलाह के अनुसार, बच्चे की अलग, साफ सोने की जगह में तकिया, ढीली रजाई, मुलायम खिलौने, नेस्ट या पोजिशनर नहीं होने चाहिए।
हर रात सब कुछ बिल्कुल सही हो, यह जरूरी नहीं। कभी खाना बनाते समय देर हो जाए या बच्चा बहुत रो रहा हो, तो जितना हो सके उतना करें। अगली रात फिर से वही क्रम अपनाएं।
कई परिवारों के लिए दो महीने के बच्चे का रात में सोने का उपयुक्त समय शाम 7 से 8 बजे के बीच हो सकता है। यह जल्दी लग सकता है, खासकर जब शुरुआती दिनों में बच्चा रात 10 बजे के बाद ही लंबी नींद लेता रहा हो।
फिर भी, शाम को थके बच्चे को देर तक जगाए रखने की कोशिश अक्सर उलटी पड़ती है।
शुरुआती शाम में शरीर में कॉर्टिसोल का स्तर स्वाभाविक रूप से कम होने लगता है। यह हार्मोन सतर्कता और तनाव से जुड़ा है। दिन भर की छोटी नींदों, दूध और नई चीजें देखने-सुनने के बाद नींद का दबाव भी बढ़ जाता है। बच्चे को बहुत देर से सुलाने पर वह जरूरत से ज्यादा थक सकता है।
बहुत थका बच्चा हमेशा नींद में सुस्त नहीं दिखता। कई बार वह ज्यादा बेचैन, चिड़चिड़ा और जागे रहने पर अड़ा हुआ नजर आता है।
हर बच्चे के लिए 7 से 8 बजे का समय तुरंत सही नहीं होगा। अगर आपका बच्चा अभी रात 9:30 बजे के आसपास सोता है, तो हर कुछ रातों में सोने का समय 15 मिनट पहले करें। देखें कि शाम को शांत होना आसान हो रहा है या नहीं और रात की पहली नींद लंबी हो रही है या नहीं। यही 2 महीने का बच्चा नींद की दिनचर्या को समझने का व्यावहारिक तरीका है।
7 से 8 सप्ताह के अधिकतर बच्चे दो नींदों के बीच लगभग 60 से 90 मिनट तक आराम से जाग पाते हैं। इसे वेक विंडो या जागने का अंतराल कहा जाता है।
इस समय में दूध पीना, नैपी बदलना, गोद में रहना, थोड़ी देर पेट के बल खेलना, पंखे को गौर से देखना, सब शामिल है। यह अंतराल बच्चे के जागने से शुरू होता है, फीड खत्म होने से नहीं।
दिन कुछ इस तरह दिख सकता है:
दिन का आखिरी जागने का अंतराल सबसे छोटा भी हो सकता है। यह बात कई माता-पिता को हैरान करती है। लगता है कि रात से पहले बच्चे को ज्यादा देर जगना चाहिए, लेकिन देर शाम अक्सर नींद सबसे ज्यादा बिगड़ती है। एक छोटी झपकी और उसके बाद थोड़ा शांत समय, रात की नींद को बेहतर बना सकता है।
अगर बच्चा 90 मिनट से जागा है लेकिन खुश है, तो घबराने की जरूरत नहीं। वहीं 45 मिनट में ही वह बहुत रोने लगे, तो सामने दिख रहे बच्चे के संकेत को प्राथमिकता दें। वेक विंडो नियम नहीं, सिर्फ मार्गदर्शन है।
विकसित होते नवजात में सर्केडियन रिदम को सहारा देने का आसान तरीका है कि दिन और रात का माहौल साफ तौर पर अलग रखा जाए।
सुबह बच्चे के जागने के बाद पर्दे खोल दें। हो सके तो खिड़की के पास समय बिताएं या बच्चे को स्ट्रोलर अथवा गोद में लेकर थोड़ी देर बाहर टहलें। हर झपकी के दौरान पूरे घर को फुसफुसाहट में चलाने की जरूरत नहीं है।
दिन के समय आप ये बातें अपना सकते हैं:
रात में दूध पिलाने का समय शांत और उबाऊ रखें। रोशनी कम रखें, बहुत कम बोलें और बच्चे के पास बैठकर तेज स्क्रीन पर मोबाइल न चलाएं। हर फीड पर नैपी बदलकर बच्चे को पूरी तरह जगाने की जरूरत नहीं है। नैपी में पॉटी हो, बहुत ज्यादा गीली हो या बच्चा असहज लगे, तभी बदलें।
संदेश सीधा है - दिन बातचीत और गतिविधि के लिए है, रात दूध पीकर फिर सोने के लिए।
इससे बच्चे की नींद एक ही रात में नहीं बदल जाएगी, लेकिन रोज मिलने वाले ये संकेत उसकी बॉडी क्लॉक को सही दिशा देते हैं।
आपने शायद “ड्राउजी बट अवेक” के बारे में सुना हो। इसका मतलब है कि बच्चे को तब उसकी सोने की जगह पर लिटाया जाए जब वह उनींदा और शांत हो, लेकिन गोद में पूरी तरह सोया न हो।
इसका उद्देश्य बच्चे को यह महसूस करने का मौका देना है कि वह किस जगह सो रहा है। समय के साथ कुछ बच्चे रात में जागने के बाद उसी जगह पर दोबारा आसानी से शांत होने लगते हैं।
लेकिन दो महीने की उम्र में यह केवल अभ्यास है, कोई परीक्षा नहीं।
दिन में एक बार कोशिश कर सकते हैं, जैसे रात के सोने के समय जब नींद का दबाव ज्यादा होता है। दूध पिलाकर और गोद में शांत करके, जब बच्चा उनींदा लगे, उसे लिटाएं। यदि वह हल्की आवाज करे, तो कुछ पल रुकें। सीने पर हल्का हाथ रखना, धीरे-धीरे “श्श्श” करना या प्यार से सहलाना मदद कर सकता है।
अगर रोना बढ़ने लगे, तो बच्चे को उठा लें। गोद में शांत करें। चाहें तो फिर कोशिश करें, या उस रात उसे गोद में ही सोने दें।
नींद की दिनचर्या बनाने के लिए दो महीने के बच्चे को रोने के लिए अकेला छोड़ना जरूरी नहीं है। इस समय आप स्वतंत्र रूप से सोने की मांग नहीं कर रहे, बस उसे परिचित और सुरक्षित संकेत दे रहे हैं। यही शिशु के लिए साधारण बेडटाइम रूटीन का आधार है।
रूटीन शाम को आसान बना सकता है। बच्चा जल्दी शांत हो सकता है और धीरे-धीरे रात की पहली नींद कुछ लंबी हो सकती है। लेकिन रूटीन इस बात की गारंटी नहीं है कि बच्चा पूरी रात बिना जागे सोएगा।
इस उम्र में बच्चे का रात में दूध के लिए 2 से 4 बार जागना सामान्य है। ग्रोथ स्पर्ट, ज्यादा भूख वाले दिन, बीमारी या विकास के दौर में बच्चा इससे अधिक बार भी जाग सकता है। स्तनपान करने वाले बच्चे अक्सर रात में बार-बार दूध मांगते हैं, और फॉर्मूला लेने वाले बच्चे भी जाग सकते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि आप कुछ गलत कर रहे हैं।
जब आप 2 महीने के शिशु की रात की दिनचर्या शुरू करते हैं, तो लक्ष्य एकदम परफेक्ट स्लीपर बनाना नहीं होता। लक्ष्य है, बच्चे के लिए हल्का-सा अनुमानित और सुरक्षित माहौल बनाना। शांत शाम की लय बच्चे को भरोसा देती है और व्यस्त दिन के बाद माता-पिता को भी थोड़ी राहत मिलती है।
इसे आसान रखें। बच्चे के संकेतों के अनुसार चलें। अधिकतर रातों में छोटे-छोटे कदम दोहराते रहें।
अभी के लिए इतना ही काफी है।