पेसिफायर या चूसनी एक छोटी-सी चीज है, लेकिन इसे लेकर राय बहुत अलग-अलग मिलती है। किसी मां को लगता है कि इससे बच्चे की नींद संभल गई, तो किसी को डर रहता है कि इससे स्तनपान बिगड़ जाएगा। घर के बड़े अक्सर दांतों पर असर की बात करते हैं, जबकि अस्पताल में नवजात के टीकाकरण या रक्त जांच के समय भी चूसनी दी जा सकती है।
तो क्या हर बच्चे को पेसिफायर चाहिए? जरूरी नहीं। बहुत से बच्चे बिना चूसनी के भी आराम से बड़े होते हैं। फिर भी, सही समय और सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो बच्चे के लिए पेसिफायर कई परिवारों के काम आ सकता है। बात हर बच्चे को चूसनी देने की नहीं है, बल्कि इसके फायदे और सीमाएं समझकर अपने बच्चे के हिसाब से फैसला लेने की है।
बच्चों में चूसने की स्वाभाविक इच्छा जन्म से ही होती है। कई बार वे भूख की वजह से दूध पीना चाहते हैं, लेकिन कई बार उन्हें सिर्फ सुकून चाहिए होता है। इसे गैर-पोषणात्मक चूसना कहा जाता है, यानी ऐसा चूसना जिसका मकसद दूध पीना नहीं है।
पेसिफायर बच्चे की इस जरूरत को पूरा कर सकता है, बिना हर बार फीड कराए। इससे कुछ बच्चों को शांत होने, सोने और छोटी चिकित्सीय प्रक्रियाओं के दौरान आराम मिल सकता है। बाल रोग विशेषज्ञों की सुरक्षित नींद संबंधी सलाह में भी झपकी और रात की नींद के समय चूसनी देने का उल्लेख मिलता है, खासकर जब स्तनपान ठीक से स्थापित हो चुका हो। इसका संबंध अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम के कम जोखिम से देखा गया है।
इसका मतलब यह नहीं कि पेसिफायर SIDS को पूरी तरह रोक देता है। सुरक्षित नींद के लिए बच्चे को हमेशा पीठ के बल सुलाना, समतल और मजबूत गद्दे का उपयोग करना, तथा पालने में तकिया, रजाई, ढीली चादर और मुलायम खिलौने न रखना भी जरूरी है।
सबसे चर्चित विषय पेसिफायर और SIDS जोखिम है। नींद के समय पेसिफायर देने और अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम के कम जोखिम के बीच संबंध पाया गया है। भारत में भी बाल रोग विशेषज्ञ सुरक्षित नींद की आदतों पर जोर देते हैं।
वैज्ञानिक अभी यह निश्चित रूप से नहीं जानते कि ऐसा क्यों होता है। संभव है कि चूसनी से बच्चा बहुत गहरी नींद में न जाए या सांस की नली की स्थिति बेहतर बनी रहे। माता-पिता के लिए व्यावहारिक बातें ये हैं:
रात के समय पेसिफायर देना चाहिए या नहीं, इसका जवाब बच्चे की स्वीकार्यता और सुरक्षित नींद के नियमों पर निर्भर करता है। चूसनी को कभी भी खिलौने, कंबल, डोरी, रिबन या किसी क्लिप के साथ पालने में न रखें।
कुछ बच्चों में चूसने की जरूरत बहुत अधिक होती है। वे अच्छी तरह दूध पी चुके होते हैं, डायपर भी साफ होता है, फिर भी हाथ मुंह में लेते हैं, मुंह ढूंढने जैसी हरकत करते हैं या बेचैन रहते हैं। हर बार इसका मतलब भूख नहीं होता।
ऐसे समय पेसिफायर मदद कर सकता है। फीड के बीच बच्चे को सुकून मिल सकता है, कार सीट या स्ट्रोलर में यात्रा आसान हो सकती है, और शाम के उस बेचैन समय में भी राहत मिल सकती है जब बच्चा बिना स्पष्ट वजह रोता रहता है। कई माता-पिता पेट दर्द या कोलिक के लिए चूसनी के बारे में पूछते हैं। पेसिफायर कोलिक का इलाज नहीं है, लेकिन चूसने से कुछ बच्चों का रोना कम हो सकता है।
इसे एक सहायक उपाय की तरह देखें। गोद में लेना, हल्के से झुलाना, उम्र के अनुसार सुरक्षित तरीके से लपेटना, टहलाना और भूख के संकेत मिलने पर फीड कराना भी उतना ही जरूरी है।
पेसिफायर दर्द में राहत देने में भी भूमिका निभा सकता है, खासकर थोड़े समय की तकलीफ में। एड़ी से रक्त का नमूना लेने, इंजेक्शन लगाने या टीकाकरण जैसी प्रक्रियाओं के दौरान चूसने से बच्चे की बेचैनी कम दिख सकती है और वह जल्दी शांत हो सकता है।
अस्पताल में डॉक्टर या नर्स कभी-कभी त्वचा से त्वचा का संपर्क, स्तनपान या चिकित्सकीय सलाह के अनुसार मुंह से दी जाने वाली मीठी दवा के साथ पेसिफायर का उपयोग कर सकते हैं। घर पर चूसनी को चीनी, शहद, गुड़ की चाशनी, जैम या किसी मीठी चीज में डुबोकर कभी न दें। 12 महीने से छोटे बच्चों के लिए शहद सुरक्षित नहीं है, क्योंकि इससे शिशु बोटुलिज्म का खतरा हो सकता है।
यह सवाल कि पेसिफायर के नुकसान क्या हैं, इसका जवाब सिर्फ हां या नहीं में नहीं दिया जा सकता। जोखिम होते हैं, लेकिन वे अक्सर पेसिफायर कब शुरू किया गया, कितनी देर इस्तेमाल हुआ और कितने समय तक चलता रहा, इन बातों पर निर्भर करते हैं।
नई मांओं की सबसे बड़ी चिंता अक्सर पेसिफायर और स्तनपान होती है। कुछ बच्चे स्तन और चूसनी, दोनों को आसानी से अपना लेते हैं। लेकिन अगर स्तनपान ठीक से शुरू होने से पहले पेसिफायर दे दिया जाए, तो कुछ बच्चों को दिक्कत हो सकती है।
शुरुआती दिनों में बच्चा सही तरीके से स्तन पकड़ना, दूध निकालना और भूख के संकेत देना सीख रहा होता है। मां का दूध भी बार-बार स्तन खाली होने से बनता है। अगर चूसनी बार-बार फीड को टाल दे, तो स्तनपान की संख्या कम हो सकती है। शुरुआती हफ्तों में इसका असर दूध की आपूर्ति पर पड़ सकता है।
इसीलिए कई स्तनपान सलाहकार कहते हैं कि नवजात में पेसिफायर कब दें इसका जवाब है, स्तनपान स्थापित होने के बाद। आमतौर पर यह लगभग 4 से 6 सप्ताह में होता है। ये संकेत बताते हैं कि स्तनपान सही दिशा में है:
अगर स्तनपान में दर्द हो रहा है, बच्चे का वजन नहीं बढ़ रहा, दूध कम बन रहा है या लैच में परेशानी है, तो पेसिफायर शुरू करने से पहले बाल रोग विशेषज्ञ या प्रमाणित लैक्टेशन काउंसलर से सलाह लें।
छोटे बच्चे की फीड में अंतर बढ़ाने के लिए पेसिफायर का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। नवजात अक्सर 24 घंटे में 8 से 12 बार दूध पीते हैं, और ग्रोथ स्पर्ट के दौरान इससे भी अधिक फीड मांग सकते हैं।
घड़ी नहीं, बच्चे के संकेत देखें। भूख के शुरुआती संकेतों में करवट लेना, छूने पर मुंह घुमाना, मुंह खोलना, होंठ चलाना और हाथ मुंह तक ले जाना शामिल हैं। रोना भूख का देर से आने वाला संकेत है। बच्चा स्तन या बोतल खोज रहा हो, तो पहले फीड दें, हर बार चूसनी नहीं।
पेसिफायर से कान का संक्रमण होने की संभावना, खासकर मध्य कान के संक्रमण की, 6 महीने के बाद कुछ बच्चों में बढ़ी हुई देखी गई है। इसका कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन लगातार चूसने से मध्य कान के दबाव और तरल पदार्थ पर असर पड़ सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चा 6 महीने का होते ही सारी चूसनियां फेंक दें। बेहतर तरीका यह है कि दिन में इसका उपयोग धीरे-धीरे कम करें और इसे मुख्य रूप से नींद या बहुत अधिक बेचैनी वाले समय तक सीमित रखें।
यदि बच्चे को बार-बार कान में संक्रमण होता है, तो बाल रोग विशेषज्ञ से पूछें कि पेसिफायर कम करने से फायदा हो सकता है या नहीं।
शैशवावस्था में पेसिफायर से आमतौर पर दांतों की समस्या नहीं होती। चिंता तब बढ़ती है जब बच्चा टॉडलर उम्र में भी लंबे समय तक चूसनी इस्तेमाल करता रहे, खासकर 2 साल की उम्र के बाद। लगातार चूसने से दांतों के मिलने का तरीका और तालू का आकार प्रभावित हो सकता है।
जो बच्चा केवल सोते समय थोड़ी देर चूसनी लेता है, उसका मामला उस बच्चे से अलग है जिसके मुंह में दिन भर पेसिफायर रहता है।
इसलिए प्री-स्कूल की उम्र आने से बहुत पहले पेसिफायर छुड़ाने की योजना बनाना समझदारी है।
यह सही नहीं है। पेसिफायर से निप्पल भ्रम की आशंका तब अधिक होती है, जब चूसनी बहुत जल्दी दे दी जाए, स्तनपान अभी स्थापित न हुआ हो या पेसिफायर जरूरी फीड की जगह लेने लगे। स्तनपान अच्छी तरह चलने लगे तो पेसिफायर इस्तेमाल करने मात्र से स्तनपान अपने-आप बंद नहीं होता।
सही समय और बच्चे की भूख के प्रति संवेदनशील रहना, दोनों मायने रखते हैं।
ऐसा नहीं है। चूसनी की आदत छुड़ाना कभी-कभी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन यह स्थायी नहीं होती। बच्चे बड़े होने के साथ सोने, खुद को शांत करने और अपनी भावनाओं को संभालने के दूसरे तरीके सीखते हैं। 6 से 12 महीने के बीच उपयोग कम करना शुरू करने से कई परिवारों को बाद में आसानी होती है।
बिल्कुल नहीं। पेसिफायर एक साधन है, माता-पिता होने का पैमाना नहीं। आप बच्चे को गोद में ले सकते हैं, स्तनपान करा सकते हैं, उसके रोने पर प्यार से प्रतिक्रिया दे सकते हैं और जरूरत पड़ने पर चूसनी भी दे सकते हैं।
नवजात की देखभाल थकाने वाली होती है। साफ और सुरक्षित पेसिफायर अगर किसी कठिन कार यात्रा या झपकी के समय बच्चे को शांत कर दे, तो इसमें कोई कमी नहीं है। यह बस एक व्यावहारिक उपाय है।
अगर आप पेसिफायर इस्तेमाल करने का निर्णय लेते हैं, तो ये नियम इसके फायदे बनाए रखते हुए जोखिम घटाने में मदद करेंगे।
स्तनपान करने वाले बच्चों के लिए स्तनपान स्थापित होने तक, आमतौर पर 4 से 6 सप्ताह, इंतजार करना बेहतर रहता है। फॉर्मूला दूध लेने वाले बच्चे को यह पहले दिया जा सकता है, लेकिन भूख के संकेत हमेशा प्राथमिकता हैं।
बच्चा स्वीकार करे तो झपकी और रात की नींद के समय पेसिफायर दें। सोने के बाद उसके मुंह से निकल जाए तो बार-बार वापस न लगाएं।
पेसिफायर सुरक्षित कैसे चुनें और इस्तेमाल करें, इसके लिए ये बातें याद रखें:
पेसिफायर छोड़ने का कोई एक तय जन्मदिन नहीं है। फिर भी, पेसिफायर छोड़ने का समय 6 से 12 महीने के बीच उपयोग घटाने से शुरू करना व्यावहारिक रहता है। इस उम्र में कई बच्चे शांत होने के दूसरे तरीके सीखने लगते हैं।
पहले इसे केवल दिन की झपकी और रात की नींद तक सीमित करें। बच्चा थोड़ा बड़ा हो तो चूसनी की जगह एक आरामदायक दिनचर्या बनाएं, जैसे लोरी, पीठ पर हल्की थपकी, गले लगाना या सोने से पहले कहानी पढ़ना।
दांतों पर असर की संभावना कम रखने और आदत आसानी से छुड़ाने के लिए 2 साल की उम्र तक इसे बंद करने का लक्ष्य रखें। बच्चे को पेसिफायर कैसे छोडाएं, इसका सबसे आसान जवाब है धीरे-धीरे और बिना लड़ाई के। अचानक छीन लेने के बजाय प्यार, धैर्य और नई दिनचर्या के सहारे बदलाव करें।
पेसिफायर न तो कोई जादुई उपाय है, न ही अपने-आप में नुकसानदायक चीज। सही समय पर, साफ-सफाई के साथ और धीरे-धीरे बंद करने की योजना के साथ इस्तेमाल किया जाए, तो शुरुआती महीनों में यह बच्चे और माता-पिता, दोनों के लिए एक छोटा सहारा बन सकता है।