बच्चे बोलकर अपनी जरूरत नहीं बता सकते, इसलिए उनका रोना ही संवाद का सबसे बड़ा माध्यम होता है। नवजात शिशु रोना इसलिए शुरू करता है क्योंकि उसे भूख लगी है, नींद आ रही है, ठंड या गर्मी लग रही है, डायपर गीला है या उसे बस अपने किसी अपने की गोद चाहिए।
कभी बच्चे के रोने के कारण तुरंत समझ आ जाते हैं। लेकिन कई बार, खासकर शाम या रात में बच्चा रोता है और हर कोशिश के बाद भी चुप नहीं होता, तो माता-पिता परेशान हो सकते हैं।
बच्चे के रोने के कारण आमतौर पर ये हो सकते हैं:
कई बार एक ही समय पर दो-तीन वजहें हो सकती हैं। भूखा बच्चा थका हुआ भी हो सकता है और गैस से परेशान बच्चा लगातार रोकर और थक सकता है। इसलिए बच्चे को शांत करना किसी एक जादुई उपाय का नाम नहीं, बल्कि उसकी जरूरतों को धैर्य से समझने की प्रक्रिया है।
हर माता-पिता चाहते हैं कि वे बच्चे के रोने की आवाज़ पहचानना तुरंत सीख जाएं। कुछ संकेत जरूर होते हैं, लेकिन हर बच्चे के लिए कोई एक तय शब्दकोश नहीं है। एक ही बच्चे का रोना भी दिन, समय और उसकी परेशानी के हिसाब से अलग सुनाई दे सकता है।
आवाज की तीव्रता, रोने का ढंग और शरीर की हरकतों को साथ में देखने पर संकेत ज्यादा साफ होते हैं।
भूख का रोना अक्सर हल्की कुड़कुड़ाहट, छोटी आवाजों या बार-बार एक जैसी ध्वनि से शुरू होता है। दूध मिलने में देर होने पर यह तेज होता जाता है। भूख का रोना कैसे पहचानें, इसके लिए रोने से पहले के इन संकेतों पर ध्यान दें:
रोना आमतौर पर भूख का देर से मिलने वाला संकेत है। यदि शुरुआती संकेतों पर ही दूध दे दिया जाए, तो बच्चा और मां दोनों ज्यादा सहज महसूस करते हैं।
थकान का रोना कैसे पहचाने? शुरू में बच्चा हल्की शिकायत जैसी आवाज निकाल सकता है या बार-बार बेचैन हो सकता है। वह आंखें मल सकता है, जम्हाई ले सकता है, खाली नजरों से देखने लग सकता है या चेहरे और खिलौनों से मुंह फेर सकता है।
कुछ बच्चे थकान में उल्टा बहुत सक्रिय हो जाते हैं। वे हाथ-पैर तेजी से चलाते हैं, जैसे नींद से लड़ रहे हों।
नवजात शिशु अक्सर केवल 45 से 60 मिनट तक ही आराम से जाग पाते हैं। जब बच्चा बहुत जोर से रोने लगे, तब तक वह जरूरत से ज्यादा थक चुका हो सकता है और उसे शांत होने में अधिक मदद लगती है।
दर्द का रोना शिशु में अक्सर अचानक शुरू होता है। इसकी आवाज सामान्य रोने से ज्यादा तीखी, तेज या चीख जैसी लग सकती है। बीच में धीरे-धीरे बेचैन होने वाला चरण नहीं होता।
बच्चा पैर पेट की ओर खींच सकता है, पीठ मोड़ सकता है, बहुत पीला दिख सकता है या गोद में लेने पर भी शांत न हो। एक बार की तेज चीख का मतलब हमेशा गंभीर बीमारी नहीं होता, लेकिन यदि आपके मन में आए कि “आज रोना कुछ अलग है”, तो बच्चे को ध्यान से जांचें और जरूरत पड़े तो डॉक्टर से बात करें।
बोरियत होने पर बच्चा रो सकता है, लेकिन उससे बात करने, चेहरे दिखाने या हल्के खेल से कुछ देर के लिए चुप भी हो सकता है। बहुत ज्यादा उत्तेजना में भी ऐसा रोना हो सकता है, मगर तब आसपास का माहौल वजह बनता है।
टीवी की तेज आवाज, बहुत सारे मेहमान, चमकदार रोशनी, लगातार यात्रा या ढेर सारे खिलौने बच्चे के लिए थकाने वाले हो सकते हैं।
इन संकेतों पर नजर रखें:
ऐसे समय में ज्यादा मनोरंजन नहीं, बल्कि कम उत्तेजना काम आती है। हल्की रोशनी वाला कमरा, गोद और एक जैसी धीमी आवाज बच्चे को आराम दे सकती है।
जब बच्चा बहुत रो रहा हो, तो घबराहट में कुछ समझ नहीं आता। ऐसे में एक छोटी सूची आपको शुरुआत करने में मदद करेगी। हर बिंदु को आराम से जांचें।
क्या बच्चे को भूख लगी है?
अगर पिछली फीड को समय हो गया है या भूख के संकेत दिख रहे हैं, तो दूध दें। स्तनपान करने वाले नवजात 24 घंटे में 8 से 12 बार, और कभी-कभी इससे भी अधिक बार दूध पी सकते हैं।
क्या डायपर बदलने की जरूरत है?
डायपर गीला, गंदा या बहुत कसा हुआ तो नहीं है, देखें। त्वचा पर लालिमा या रैश भी जांचें।
क्या बच्चे को गर्मी या ठंड लग रही है?
हाथ-पैर नहीं, बल्कि बच्चे की छाती या गर्दन के पीछे छूकर तापमान समझें। हाथ-पैर अक्सर ठंडे महसूस हो सकते हैं। सोने के लिए कमरा बहुत गर्म न रखें, आमतौर पर 20 से 24°C के आसपास का आरामदायक तापमान ठीक रहता है। जरूरत के अनुसार एक हल्की परत कम या ज्यादा करें।
क्या बच्चा थका हुआ है?
रोशनी धीमी करें, आवाजें कम करें और अपनी रोज की सुलाने वाली दिनचर्या शुरू करें। बच्चे के बहुत ज्यादा रोने का इंतजार न करें। नींद के शुरुआती संकेत मिलते ही कोशिश करें।
क्या गैस या पेट में दर्द है?
फीड के बीच में और बाद में डकार दिलाने की कोशिश करें। बच्चे को अपने कंधे से सीधा लगाकर रखें, उसके पैरों को हल्के से साइकिल की तरह चलाएं या शांत अवस्था में पेट पर घड़ी की दिशा में बहुत हल्की मालिश करें।
क्या आसपास बहुत ज्यादा शोर या हलचल है?
बच्चे को शांत कमरे में ले जाएं, टीवी बंद करें और लोगों को कुछ देर दूरी रखने को कहें। पूरी खामोशी जरूरी नहीं, लेकिन शांत और एक जैसा माहौल मददगार होता है।
क्या उसे सिर्फ गोद और अपनापन चाहिए?
बच्चे को उठाएं, सीने से लगाएं और धीरे से बात करें। बार-बार गोद मांगना जिद या चालाकी नहीं है। छोटा बच्चा अपने परिचित व्यक्ति के स्पर्श से सुरक्षित महसूस करता है।
यह तरीका आपको व्यावहारिक रूप से समझने में मदद करता है कि बच्चा क्यों रोता है। यदि पूरी सूची देखने के बाद भी कोई साफ वजह न मिले, तब भी परेशान न हों। कभी-कभी सभी बुनियादी जरूरतें पूरी होने पर भी बच्चे को शांत होने के लिए सहारे की जरूरत होती है।
हर बच्चे और हर स्थिति के लिए एक ही उपाय काम नहीं करता। अक्सर दो-तीन छोटे उपाय मिलकर असर दिखाते हैं। पहले जरूरतें पूरी करें, फिर आराम देने के तरीके आजमाएं।
छोटे बच्चे के लिए सबसे पहले भूख जांचना सही रहता है, क्योंकि यही सबसे आम कारण है। स्तनपान, बोतल या निकाला हुआ मां का दूध दें। नवजात अवस्था में बार-बार दूध पीना सामान्य है, इसे खराब आदत न समझें।
यदि बच्चा फीड के दौरान बार-बार रोता है, पीठ मोड़ता है, खांसता है, बहुत ज्यादा उल्टी करता है या लगभग हर फीड के बाद असहज दिखता है, तो बाल रोग विशेषज्ञ या स्तनपान सलाहकार से बात करें। फीडिंग की दिक्कत और रिफ्लक्स में मदद मिल सकती है।
रोते शिशु को कैसे संभालें, इसका सबसे कोमल तरीका है त्वचा से त्वचा का संपर्क। बच्चे को केवल डायपर में अपने नंगे सीने पर सीधा रखें और उसकी पीठ को हल्के कपड़े या चादर से ढक दें। आप आराम से बैठें और जागते रहें।
आपकी गर्माहट, दिल की धड़कन, सांस की लय और परिचित खुशबू बच्चे को स्थिर महसूस कराने में मदद करती है। इससे स्तनपान और आपसी जुड़ाव को भी सहारा मिल सकता है। यह केवल जन्म के तुरंत बाद का तरीका नहीं है, कई हफ्तों और महीनों तक उपयोगी रहता है।
नवजात शिशु रोना कम करने के लिए 5 S तकनीक काफी लोकप्रिय है। ये तरीके गर्भ में मिलने वाली कसावट, लय और सुरक्षा जैसी अनुभूति देते हैं।
हर बार पांचों तरीके अपनाने की जरूरत नहीं है। एक या दो तरीके आजमाएं और देखें कि आपके बच्चे को किससे आराम मिलता है।
सही तरह से पहना हुआ स्लिंग या बेबी कैरियर गर्माहट, गोद और हल्की गति, तीनों देता है। देर दोपहर या शाम के उस समय यह बहुत काम आ सकता है, जब बच्चा लगातार गोद चाहता है और आपको भी दोनों हाथों की जरूरत होती है।
TICKS सुरक्षा नियम याद रखें:
बच्चे का चेहरा कपड़े से ढका न हो। स्लिंग में दूध पिलाते समय उसे लगातार देखें और फीड के बाद बच्चे को सीधा व सुरक्षित स्थिति में रखें।
एक जैसी धीमी आवाज कुछ बच्चों को शांत कर सकती है, क्योंकि इससे घर की अचानक आने वाली आवाजें दब जाती हैं। बारिश, पंखे की हल्की आवाज या विशेष व्हाइट नॉइज़ रिकॉर्डिंग उपयोगी हो सकती है। बदलती धुन वाले गानों के बजाय एक स्थिर आवाज चुनें।
आवाज लगभग 50 डेसिबल या उससे कम रखें, यानी शांत बातचीत के स्तर के आसपास। डिवाइस को पालने या बिस्तर से दूर रखें। बच्चे के सिर के पास पूरी रात तेज आवाज चलाना सुरक्षित नहीं है।
जब कमरे में कुछ भी काम न कर रहा हो, तो माहौल बदलकर देखें। बालकनी में खड़े हों, खुली खिड़की के पास जाएं या बच्चे को लेकर धीरे-धीरे टहलने निकलें। ताजी हवा और अलग दृश्य कभी-कभी रोने का सिलसिला तोड़ देते हैं।
दूसरे कमरे में जाना भी मदद कर सकता है। कई बार बच्चे के साथ-साथ मां या पिता को भी कुछ पल का बदलाव चाहिए होता है।
गुनगुने पानी से नहलाना तनाव में दिख रहे बच्चे को आराम दे सकता है, खासकर रात की नींद से पहले। पानी न बहुत गर्म हो, न ठंडा। नहलाने से पहले तौलिया, कपड़े और डायपर पास रख लें, ताकि बच्चे पर हर समय आपका हाथ बना रहे।
हर बच्चे को नहाना पसंद नहीं होता। अगर पानी में जाते ही बच्चा और ज्यादा रोने लगे, तो यह तरीका छोड़ दें। सोने की ऐसी दिनचर्या अपनाने की जरूरत नहीं जो सबके लिए तनाव बन जाए।
कार की हल्की कंपन या प्रैम में टहलने की गति, खासकर जब रात में बच्चा रोता है, कई बच्चों को सुला सकती है। बच्चे को सही कार सीट या प्रैम हार्नेस में सुरक्षित तरीके से बांधें।
अगर बच्चा कार सीट में सो जाए, तो पहुंचने के बाद संभव हो तो उसे जल्दी ही पीठ के बल किसी समतल और सख्त सोने की जगह पर लिटा दें। कार सीट यात्रा के लिए है, रोजाना लंबे समय तक सोने के लिए नहीं।
जब स्वस्थ दिखने वाला बच्चा बिना किसी साफ वजह के बहुत रोता है, तो इसे अक्सर कोलिक या पेट दर्द वाली बेचैनी कहा जाता है। एक प्रचलित परिभाषा के अनुसार, दिन में 3 घंटे से अधिक, सप्ताह में कम से कम 3 दिन और लगातार कम से कम एक सप्ताह तक रोना कोलिक की ओर संकेत कर सकता है।
यह अक्सर जन्म के शुरुआती हफ्तों में शुरू होता है, 6 से 8 सप्ताह की उम्र में ज्यादा हो सकता है और अधिकतर बच्चों में 3 से 4 महीने तक बेहतर हो जाता है।
कोलिक के संभावित लक्षण:
कोलिक बहुत थकाने वाली स्थिति हो सकती है, लेकिन यह खराब परवरिश की वजह से नहीं होता। कोई भी ड्रॉप, हर्बल सप्लीमेंट, घरेलू नुस्खा या फीडिंग में बड़ा बदलाव करने से पहले बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लें।
यदि बच्चा गंभीर रूप से अस्वस्थ लगे तो तुरंत नजदीकी अस्पताल की आपात सेवा में जाएं या भारत में 112 अथवा उपलब्ध स्थानीय एम्बुलेंस सेवा, जैसे 108, पर कॉल करें। खासकर इन स्थितियों में देर न करें:
आप अपने बच्चे को सबसे अच्छी तरह जानते हैं। मदद मांगना हमेशा सही फैसला है।
ऐसे दिन भी आएंगे जब आपने दूध पिलाया, डायपर बदला, डकार दिलाई, गोद में लिया, झुलाया, टहलाया, “श्श्श” किया और फिर भी बच्चा रो रहा है। उस समय गुस्सा, घबराहट, उदासी या बहुत तीखी झुंझलाहट महसूस होना असामान्य नहीं है। बच्चे का रोना ऐसा ही होता है कि उसे अनदेखा करना मुश्किल लगे। इससे आप बुरे माता-पिता नहीं बन जाते।
उस पल आप क्या करते हैं, यही सबसे अहम है।
यदि आपको लगे कि आप अपनी सीमा पर पहुंच गए हैं:
सुरक्षित कॉट में रोता बच्चा, तनाव में टूट चुके वयस्क की गोद में रहने से ज्यादा सुरक्षित है। बच्चे को कभी भी झकझोरें नहीं। कुछ सेकंड का झकझोरना भी गंभीर मस्तिष्क चोट या जानलेवा नुकसान पहुंचा सकता है।
बच्चे को शांत करना हमेशा किसी एक अचूक तरकीब को खोज लेना नहीं है। यह बार-बार कोशिश करने, संकेतों को समझने और मुश्किल दिनों में मदद लेने का नाम है। आपके बच्चे को पूर्णता नहीं चाहिए। उसे सुरक्षा, स्नेह और ऐसे माता-पिता चाहिए जो जरूरत पड़ने पर अपना सहारा भी ढूंढ लें।